Wednesday, 10 January 2018

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yo studio

बचपन भी कमाल का था
खेलते खेलते चाहें छत पर सोयें
या ज़मीन पर
आँख बिस्तर पर ही खुलती थी !!
झूठ बोलते थे फिर भी कितने सच्चे थे हम
ये उन दिनों की बात है जब बच्चे थे हम
सुकून की बात मत कर ऐ दोस्त
बचपन वाला इतवार अब नहीं आता
कितने खुबसूरत हुआ करते थे बचपन के वो दिन
सिर्फ दो उंगलिया जुड़ने से दोस्ती फिर से शुरु हो जाया करती थी
आशियाने 😚 जलाये जाते हैं जब तन्हाई की आग से, ☺️ तो बचपन के घरौंदो की वो मिट्टी याद आती है 🤗 याद होती जाती है जवां बारिश के मौसम में तो, बचपन की वो कागज की नाव 🙂 याद आती है

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